यही है यथार्थ/सुनील वर्मा

कुछ भी तो बदला नहीं…

फूल भी…पत्तियां भी नहीं…

घर के सामने..

छोटे से उस बगीचे में खड़ा पेड़…

उसी मुस्तैदी के साथ खड़ा तो है…

खिली तो हैं बेलें…

हर वर्ष की तरह…इस वर्ष भी…

फल देने को आतुर सी…नादान हैं ये…

इन्हें क्या पता कि…

कुछ ही दिनों बाद…इस जमीन पर…

जिस पर खड़ी मुस्कुरा रही हैं वो…

ढेले बन जायेंगे…मनहूसियत से निष्ठुर…

बेसहारा वृद्ध के…

मस्तक पर कसी प्रत्यंचाओं सी…खिंच जायेंगी लकीरें…

पीला पड़ गया शरीर इसका..एक बूंद जल तो क्या…

एक कतरा आंसू भी नहीं पिला सकेगा…

सूख जाएगा…

हरी पत्तियों का ताज…कांटे बन जाएगा…

घाव कर देंगें…

गली के आवारा कुत्ते…

कुरेद डालेंगे इसे…

हा! विडम्बना…!

कि कोई नहीं रोकेगा उनको…!

हथेलियों से थपथपाना तो क्या…

पैरों से भी रोंदेगा नहीं…

घायल इस जमीन के घाव कोई…

सुनेगा भी नहीं…

आहत, करुण रूदन इसका…

शहर के प्लेटफार्म पर…

यतीम लोगों की तरह बिखरे…सारे मोहल्ले के तिनके…और रद्दी कागज..

महफ़िल जमा लेंगे यहाँ…

खूबसूरत पार्क में, प्रेमी-प्रेमिका के युगल जैसे उड़ते फिरेंगे…

रोकने के लिए आवारगी को…

लगाईं गयी ये बाढ़…

खुद भी आवारा हो जायेगी…!

ढक  लेंगी नादान इन बेलों को…बेखबर पेड़ को भी…!

किन्तु ऐ मासूम बगिया के फूलों…

कसम है तुम्हे…

कि भूल कर भी मत कह देना कभी तुम…

कि निष्ठुर हो गया है रखवाला हमारा…

बदल गया है…

क्रूरता जाग गई है उसकी…

क्योंकि निष्ठुर नहीं है वो…क्रूर भी नहीं…!

मन की आँखों से देखना तुम…

वहीं किसी कोने में आंसू बहाता मिलेगा तुम्हें…

रखवाला तुम्हारा…!

आंसुओं को हथेली पर सहेजे हुए…

दूर से ही पूछेगा तुमसे…

कि क्या प्यास लगी है तुम्हें?

पानी तो नहीं, दो  बूंद आंसू हैं पास मेरे…

सहेज कर रखे हैं मैंने…

तुमको पिला दूँगा मैं…!

मगर रोना नहीं तुम…मरना भी नहीं…मेरी तरह…

तुम्हें जीना है…जीना ही है दोस्तों…

पुत्र हो मेरे तुम…सुनो…

जड़ हो गया है तुम्हारा पिता…!

एक फूल…बस एक फूल मांगता है तुमसे…

तुम्हें क्या याद नहीं…कि आने वाला है बसंत…

क्या एक फूल भी नहीं दोगे तुम…?

नहीं सुनाओगे…

पवन के झोंकों का गीत…?

प्यार से सींचा है तुम्हें…जीवन भर मैंने…

देखा है बचपन तुम्हारा…

गाई हैं लोरियाँ भी…

थपथपाया है…सुलाया है तुम्हें…

कितनी बार रूठे थे तुम…मुरझा गए थे…!

हर बार संभाला है मैंने तुम्हें…

किन्तु अब…ऐ पुत्रों…

मजबूर है तुम्हारा पिता…!

हिल भी नहीं सकता है देखो…!

हाथ बंधे हैं…!

बेडियाँ पड़ी हैं पैरों में…

उसकी आँखों में देखना तुम…

वही प्यार…वही अथाह प्यार दिखेगा तुम्हें….

इसीलिए गुजारिश है तुमसे….

की क्रूर मत कहना उसे…निष्ठुर मत कहना…

सह जाना हर दुःख…हर दर्द…

उफ़! तक नहीं करना तुम…

क्योंकि यही नियति है…

यही है यथार्थ….

तुम्हारा भी…

उसका भी…!


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The Discussion

1 Comment on यही है यथार्थ/सुनील वर्मा

  1. Vijai Prakash dixit says:

    बहुत ही अच्छी पक्तिया है आपकी डिल को छू जाने वाली , खास कर जो आपने क्या वो बलात्कार था में लड़की की करूँ वेदना

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