भीषण सवेरा/सुनील वर्मा

है सजल भीषण सवेरा

हाथ से पतवार छूटी

स्वप्न बिखरा नाव टूटी

मंजिलों को आह भीषण

आँधियों ने आन घेरा |

हा! लहू की लालिमा से

सन गया है आज अम्बर

आसमां से आग बरसी

जल गए सब दिग-दिगंतर

क्या करें जब बन गया हो

भाग्य ही अभिशाप मेरा |

वो मुसाफिर था थका था

आंशियां की चाह थी, हाँ

रात सोने को रुका था

रात बीती कर लिया फिर

दूसरे घर में बसेरा|

बच गया क्या पास मेरे

लुट गया क्या आज मेरा ||

Shraddhanjali-Hindi-Poems-SEVERE-MORNING

Share |

The Discussion

3 Comments on भीषण सवेरा/सुनील वर्मा

  1. Dipty Joshi says:

    बेहद संवेदनशील

  2. Dipty Joshi says:

    निकला है ये सुंदर सबेरा
    इस घर में किया है एक नन्ही जन ने बसेरा|
    हमने मिलकर देखा था एक सपना
    मुसाफिर के जाने से जो न बन सका अपना |
    फिर खिलता कमल देख
    संजोरही हूँ बिखरा सपना |

  3. Manoj Kumar Jaiswal says:

    डॉ. वर्मा की कविता सीधे दिल को छू जाती है, भावनाओं की गंगा में ज्वार उठने लगते है. हर कविता में ह्रदय से निकली धवनि की गूंज सुनाई देती है . शब्द मन को आंदोलित करते है.

    यहीं यथार्थ है,
    जीवन का,
    मुसाफिर की , गंतब्य तक पहुंचकर,
    प्रस्थान करना,
    यही नियति है,
    यही सत्य है.
    पर उसके पदचिन्ह रह जाते है,
    हमें राह दिखाने के लिए,
    डॉ. मनोज कुमार जैस्वाल

Leave a Reply

Top