दिख गया है चाँद/सुनील वर्मा

चाँद दिख गया है माँ…

अर्ध्य भी दे दिया है मैंने…

अर्पण कर दो…

धुप और दीप…

खोल लो व्रत अपना…

डैडी को कह दिया है…

कि पार्टी में जाना है…

नया सूट पहन लेना…

मेरी सखियों के पापा…आयेंगे वहाँ…

तुम भी जाना पापा…

लाड़ली बेटी हूँ तुम्हारी…

कैसे टाल दोगे…

ये छोटी सी बात…!

बस जाना ही तो है…!

माँ के साथ…!

मुझ पर नहीं…

तो मम्मी पर तो दया करो…देखो…

कितनी उदास है वो…

अपलक देख रही है…

आसमान की ओर…

समय से पूर्व ही…

वृद्ध हो चली…आँखें….

धुंधला गयी हैं…

कंपन आ गया है…उन उँगलियों में अब…

जीवित कर देती थी जो…

कैनवास पर भावों को…!

ढाल सकती थी…उदासी को भी….

रंगों में…

इन्हीं अंगुलियों से माँ….!

किन्तु आज…

अशक्त हो गए वो हाथ…

असमर्थ हैं पापा…!

खो गए हैं तूलिका के भाव….!

और कैनवास का रेगिस्तान…

चेहरे पर बिखर गया है…!

उसकी पेटिंग्स के चेहरों की निर्जीव झुर्रियाँ…

दर्पण में उतर आई हैं…!

सजीव हो गयी हैं वो….!

ध्यान से देखो पापा…

करीब से देखो…!

आँखों का सूनापन देखो…!

उलझे हुए बालों का वीराना…!

सुनो तो ह्रदय की करुण चीत्कार का शोर…!

सफ़ेद साडी में लिपटी…

क्षत-विक्षत प्रतिमा सी…

तुम्हारी जीवन संगिनी है ये…

व्रत रखा है तुम्हारे लिए…

अर्ध्य दे दिया है मैंने…

बता दिया है….

कि दिख गया है चाँद…

किन्तु सुनो तुम….

रो-रोकर कह रही है वो….

कि नहीं…

मेरा चाँद नहीं दिखा मुझे…!

अभी नहीं…!!


Shraddhanjali-Hindi-Poems-I-COULD-NOT-SEE-MY-MOON-2

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The Discussion

1 Comment on दिख गया है चाँद/सुनील वर्मा

  1. Dipty Joshi says:

    बेहद मर्मस्पर्शी

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