दो-चार दीये ही सही…जला तो दो/सुनील वर्मा

रोज़ तो जलाती थी दीये…

मेरी तस्वीर पर तुम…

आज…

घर-घर में दीये जले हैं…

गलियों..में…दरवाजों पर…

बगीचों में जले हैं दीये…

दूर क्षितिज़ तक नज़रें उठा कर देखो…

सारे सितारे जैसे…

जमीन पर उतर आए हैं..

दीये बनकर…

खुशी है उल्लास है…

पटाखों के शोर के बाद…

बच्चों की तालियाँ – किलकारियां…

सुनती तो होंगी…तुमको भी प्रिये…?

पथराई हुई आँखें मेरी…

हर गली में उछलते खिलखिलाते बच्चों के झुण्ड में…

मेरी गुडिया को ढूँढते-ढूँढते…

थक गयी हैं…!

मुझे देखो…

मेरी बेबसी को देखो तुम…

अधिकार से नहीं…

दयनीय बनकर पूछता हूँ मैं…

कि बता दो मुझे…

कहाँ है गुडिया मेरी…?

क्यों नहीं सुनता मुझे…

आह्लादित स्वरों की गूंज में…

स्वर उसका…?

इतना वृद्ध तो नहीं हुआ हूँ…

कि धूमिल पड़ गयी हो दृष्टि मेरी…!

पहचान ना सके जो…

मेरी गुड़िया को…बच्चों की भीड़ में…!

जानता हूँ मैं…

कि बहुत बंधन लगाती हो तुम…

तुम्हीं ने रोका होगा…उसे…

दोस्तों के घर जाकर…खुशियाँ मनाने से…!

दीये जलाने हैं मुझे…उसने तो कहा होगा…

किन्तु तुम्हीं ने…

मना कर दिया होगा उसको…

दीये भी जलाने से…!

तभी तो सारी दुनिया की रातों का अँधेरा…

मेरे आँगन में ही बिखरा पडा है आज…!

एक भी दीया नहीं…!

रोशनी की एक किरण भी…

दिखाई नहीं देती…!

अज्ञान मत बनो…

मेरी तस्वीर को दीया मत दिखाओ प्रिये…

मुझे ही दे दो रोशनी…!

जरा सी रोशनी बस…

हजारों नही…

बस दो-चार दीये ही..सही

जला तो दो…!

देखो मुझे…

यहाँ आँगन में..खड़ा हूँ मैं…!

उसी बेल पत्र के पीछे…

फूलों की पंखुड़ियों को ध्यान से देखो…

बेतरकीब उगी घास पर…

बैठा तो हूँ…!

घर के कंगूरे पर खड़ा…

देख रहा हूँ अंधेरों से भरे…

आँगन को अपने…!

तभी तो कह रहा हूँ तुमसे….

कि हर साल की तरह…

दीये जला दो…रोशन कर दो…

कोना-कोना घर-आँगन का तुम…!

जाने दो गुड़िया को मेरी….

दोस्तों के घर…

बंधन मत लगाओ…मान भी लो…

मेरा कहा…!

हज़ारों नही…

तो दो-चार दीये ही सही….

जला तो दो…!!

Shraddhanjali-Hindi-Poems-DIWALI

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