होली है आज/सुनील वर्मा

होली है आज…

अबीर और गुलाल…ले आया हूँ मैं…

चावल और दूध भी…ले आऊँगा…

खीर बना देना प्रिये…

मलाई के लड्डू भी…

कितने दिन तो हो गए….

बना भी देना आज…

और हाँ…

गुड़िया के हिस्से की खीर भी…

मुझे ही दे देना…

क्या पता…कि वो ना खाए…!

बनाओ तुम…

मुझे नोट्स लिखने हैं…

वही लिखता हूँ तब तक…

कल छुट्टी नहीं है ना…

पढ़ाना है मुझे…

और विषय बहुत पेंचीदा है…

नया ज्ञान…नया विज्ञान…

सब कुछ नया…

तुम्हें बताता हूँ आज…

किसी से कहना नहीं…

कि थक गया है मस्तिष्क मेरा…पुराना पड़ गया है प्रिये..!

तुम्हीं कहो अब…

कि कैसे समझ लूँ…

ये पेंचीदा नया ज्ञान…

पुराने मस्तिष्क से…!

देखना तुम…

कि एक दिन अचानक…

मेरा ये पुराना मस्तिष्क…

नया हो जायेगा…

नया जन्म हो जायेगा मेरा…

बीस वर्ष पूर्व की जवानी की तरह…

सबल हो जायेगा मेरा शरीर…

और तब…

उस नए जन्म मे…

नए मस्तिस्क से…

नया विज्ञान समझ सकूंगा मैं…

विषय..

पेंचीदा नहीं रह जाएगा…तब..!

देख लो तुम…

बहुत कुछ करना है मुझे…

सब कर लूँगा…

तुम तो बस इतना करो प्रिये…

कि मलाई के लड्डू…

और खीर…मुझे भी दे देना..अभी…

जरुर दे देना…देखो..

क्योंकि बीत गए हर साल की तरह…

इस बरस भी…

होली है आज…

अबीर और गुलाल…

ले आया हूँ मैं…!!


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