सरस्वती की प्रतिमा सी/सुनील वर्मा

देखो मुझे…

सफ़ेद साड़ी में…

बाल बिखेरे हुए…

बिंदिया के बिना…

टूटी चूड़ियों पर खड़ी मैं…

सूनी कलाई लिए…

कैसी लगती हूँ…?

सच-सच कहो…

सरस्वती की प्रतिमा सी लगती हूँ मैं…?

पता है तुम्हें…

बहुत ज्ञान हो गया है मुझे…

बहुत अनुभव भी…

सोई सी दिखा करती आँखें…यें…

बहुत तेज हो गई है…

कुंद सा रहने वाला मस्तिष्क..

दौड़ता है अब बहुत तेज…

तुम्हारी ही कमियों को अक्सर कुरेदती जिह्वा…

सिर्फ तारीफ़ करती है तुम्हारी अभी…

तूलिका से कैनवास पर…रंगों को सजाता हुआ ये मन…

भूल जाता था तुमको…तुम्हारी पसंद-नापसंद को…

किन्तु अब तो…

हाल ये है प्रिये…

कि तुम हो…

सिर्फ तुम हो मन मे मेरे…

तुम नहीं मांगोगे…

मत मांगना…

पता है मुझे कि…

प्यास लगी है तुमको…

पानी देना है…

फुलवारी को तुम्हारी…

हमेशा कहती थी…कि…

किताबों को छोड़कर हमसे बातें करो…

किन्तु अब तो..

चुप भी रहोगे तुम…बिलकुल चुप…

तो भी शिकायत नहीं करुँगी मैं…!

देर से आते थे कभी…

तो चिल्लाती थी तुम पर…

किन्तु अब…

हां सच कहती हूँ प्रिये…!

कि उफ़ भी नहीं करुँगी…कुछ भी नहीं कहूँगी मैं…!

तुम्हारे देर से आने की तो क्या…

ना आने की शिकायत भी नहीं करुँगी प्रिये…!

तुम्हीं कहो…

कैसे कर सकती हूँ शिकायत…

कैसे कर सकती हूँ क्रोध…

सफ़ेद साड़ी पहनकर…

सरस्वती की प्रतिमा जो बन गयी हूँ…!!


Shraddhanjali-Hindi-Poems-2

Share |

The Discussion

Leave a Reply

Top