तो तूलिका नही उठाती मै/सुनील वर्मा

तूलिका उठाई थी मैंने…

चित्र बनाना था…कैनवास पर…

भरने थे कल्पना के रंग…

काल्पनिक कहानी कहती लकीरों में मुझे…!

विचार भी आया था…

कि डरावनी रात मे…

भीषण तूफ़ान मे उलझे…तिनके बना दूंगी…

या कि उतार दूंगी…

ज्वार-भाटाओं से लड़ती कश्तियाँ…

मकड़जाल में उलझे कीट पतंगे या कि…

जलता हुआ जंगल बना दूंगी मैं…!

कल्पना ही की थी…

यह तो सोचा भी नहीं था मैंने…

कि कल्पना की वो तस्वीरें…

मूर्त रूप ले लेंगी…

जीवित हो जाएँगी वो…

बिखर जाएँगी मेरे ही चारों ओर…वास्तविकता बनकर…

डरावनी रात के अँधेरे…

मेरे ही चेहरे पर उतर आयेंगे…

सोचा भी नहीं था…!

कि वो भीषण तूफ़ान…

तिनकों को नहीं…

ले उड़ेगा…बिंदिया को मेरी…

उलझा देगा केश भी…विधवा बना देगा मुझे…!

ज्वार-भाटाओं में कश्तियाँ नहीं…

घर डूब जायेगा मेरा…!

सोचा भी नहीं था….

कि उलझ जायेंगे…

मासूम बच्चे मेरे…

भयानक उस मकड़जाल में…!

जंगल की वो आग…

जीवित हो जायेगी…

राख कर देगी…सपनों का महल…!

आभास भी होता अगर…

तो तूलिका नहीं उठती मैं…

कभी ना सजाती कैनवास…कल्पना की उन तस्वीरों से…!

शायद आभास था उसे…

कि जीवित हो जाएंगे ये काल्पनिक चित्र…

जला देंगे आंशियां उसका…

आँधियों में उड़ा देंगे…

तभी तो नहीं भाते थे उसे…

तूलिका और कैनवास के रंग…

हाँ यही था…

यही था शायद…!!


Shraddhanjali-Hindi-Poems-3

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