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भीषण सवेरा/सुनील वर्मा

है सजल भीषण सवेरा

हाथ से पतवार छूटी

स्वप्न बिखरा नाव टूटी

मंजिलों को आह भीषण

आँधियों ने आन घेरा |

हा! लहू की लालिमा से

सन गया है आज अम्बर

आसमां से आग बरसी

जल गए सब दिग-दिगंतर

क्या करें जब बन गया हो

भाग्य ही अभिशाप मेरा |

वो मुसाफिर था थका था

आंशियां की चाह थी, हाँ

रात सोने को रुका था

रात बीती कर लिया फिर

दूसरे घर में बसेरा|

बच गया क्या पास मेरे

लुट गया क्या आज मेरा ||

Shraddhanjali-Hindi-Poems-SEVERE-MORNING

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